बहुत से मानव कहते हैं कि आत्मा करता है कहना सही नहीं है, करती है कहना सही है। जोकि उचित नहीं है। वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों में आत्मा को पुल्लिंग ही बताया गया है। संस्कृत भाषा में भी आत्मा को पुल्लिंग ही बताया गया है। सबसे पहले हम वेदों के संदर्भ में आत्मा शब्द को जाँचते हैं:
अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् ध्रुवं मध्य आ पस्त्यानाम् ।
जीवो मृतस्य चरति स्वधाभिरमर्त्यो मर्त्येना सयोनिः ॥
(ऋग्वेद 1.164.30)
यहाँ पर अनच्छये तुरगातु जीवमेजद् कहा गया है। अगर इसे संधि विच्छेद करें तो अनच्छये + तुरगातु + जीवम् + एजत् कहा जाएगा। इस में आत्मा के लिए जीव और गति करने के लिए एजत् शब्द का प्रयोग किया गया है। एजत् धातु: √इज् इजति है, जिसका अर्थ है चलना, हिलना, गति करना। लकार इसमें लट् है (वर्तमान काल), पुरुष इसमें प्रथम पुरुष है, एकवचन है, लिंग इसमें पुल्लिंग क्रिया है। इस प्रकार से इस का उत्तर है कि आत्मा गति करता है न कि आत्मा गति करती है। एष और सः शब्द, जोकि पुल्लिंग है, का उपयोग ऋग्वेद तथा यजुर्वेद में कई जगह पर हुआ है। वेदों में कहीं भी आत्मा को स्त्रीलिंग करती है के रूप में नहीं कहा गया है।
बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय 3 के सप्तम ब्राह्मण में कहा गया है:
एष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः;
यानि एषः – यह आत्मा (पुल्लिंग) ; नित्यः – नित्य है; महिमान – महान है; आत्मा – आत्मा। यहाँ पर भी आत्मा के लिए एषः प्रयोग हुआ है, स्त्रीलिंग सा या एषा नहीं।
कठ उपनिषद् के अध्याय एक के वल्ली दो में संख्या 18 पर एक मंत्र है:
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
(कठोपनिषद् 1.2.18)
इस में अगर शब्द विग्रह करें तो अयम् – यह (आत्मा); अजो – अजन्मा; नित्यः – सदा रहने वाला; शाश्वतः – शाश्वतः; पुराणः – आदि कालीन; न हन्यते – नहीं मारा जाता; हन्यमाने – शरीर मारे जाने पर भी। यहाँ पर भी अयम्, नित्य, शाश्वतः जैसे पुल्लिंग शब्द हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी आगे चल कर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.20)
अर्थात यह आत्मा न कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है। यहाँ पर भी आत्मा के लिए नायं यानि न+अयम् पुल्लिंग का प्रयोग हुआ है। उसी दूसरे अध्याय में ही श्लोक संख्या 17 में कहा गया है:
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.17)
वासांसि जीर्णानि यथा विहायनवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यानि संयाति नवानि देही॥
(श्रीमद्भगवद्गीता 2.22)
यहाँ पर श्लोक संख्या 17 में आत्मा को अविनाशी बताया गया है और येन शब्द का प्रयोग किया गया है जोकि पुल्लिंग है। उससे आगे श्लोक संख्या 22 में भी देही शब्द का उपयोग हुआ है जोकि पुरुष वाचक है। वैसे भी आत्मा को कर्ता कहा गया है यानि मैं (आत्मा) करता है, इसका अर्थ मैं करती हूँ नहीं है।
आत्मा पुल्लिंग ही है। वेदों, उपनिषदों में जहाँ पर भी आत्मा का उल्लेख आता है, और वहाँ भी आत्मा को पुल्लिंग में ही संदर्भित किया गया है। आत्मा का शास्त्रीय लिंग पुल्लिंग है जैसे एषः, अयम्, नित्यः, सः इत्यादि। आत्मा करता है यानि ये यह कर्तृ रूप में आता है, जैसे गृह्णाति, विहाय या संयाति आदी।
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