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Rajesh Takyar

श्री गर्ग संहिता के माधुर्यखण्ड के पहले अध्याय के १०४ पृष्ठ पर एक कथा है:

 

परिपूर्णतम स्यापिदुर्वासास्ते गुरुस्मृतः ॥

 

अहोतद्दर्शनं कर्तुमनोनश्वोद्यतं प्रभो ॥ १८ ॥ अद्यदेवनिशीथिन्याव्यतीते प्रहरद्वये ॥

 

कथंतद्दर्शनंभूयादस्माकम्परमेश्वर ॥ १९ ॥

 

गवान विष्णु के पूर्व कथित वर से कुछ श्रुतियाँ गोपियाँ बन कर वृंदावन में रह रही थी। एक दिन श्री कृष्ण उन गोपियों से बोले- “आज मेरे साक्षात् गुरू भगवान दुर्वासा मुनि भाण्डीर-वन में पधारे हैं। गुरू ब्रह्मा हैं, विष्णु हैं, भगवान् महेश्वर हैं और साक्षात् परम ब्रह्म हैं। गुरू सम्पूर्ण देवताओं के स्वरूप हैं। मैं उनका अभी-अभी पूजन करके आया हूँ।”

 

गोपियों ने विस्मय से कहा- “बड़े आश्चर्य की बात है कि आप के भी गुरु हैं। हमारा मन उन्हें देखने को करने लगा है। आप बताइए कि हम उनके कैसे दर्शन पा सकते हैं।”

श्रीकृष्ण बोले- “इस विशाल यमुना नदी के पार जाकर तुम उनके दर्शन पा सकती हो।”

 

तब गोपियों ने पूछा- “हम इस उफनती हुई नदी के पार जायेंगीं कैसे?”

 

ब श्रीकृष्ण बोले- “अगर सच में तुम पार जाना चाहतीं हो तो यमुना के किनारे जाकर मार्ग पाने के लिए कहना- ”यदि श्रीकृष्ण बाल ब्रह्मचारी हैं और सब दोषों से रहित हैं तो हम को यमुना जी रास्ता दे दो।”

 

गोपियों को श्रीकृष्णजी की बात सुन कर हैरानी तो बहुत हुई परन्तु फिर भी वे सब, बहुत अधिक छप्पन भोग, पात्रों में लेकर यमुना जी के किनारे पहुँची और श्रीकृष्ण जी की कही हुई बात दोहरा दी।

 

उन्हें आश्चर्य हुआ देख कर कि यमुना जी ने रास्ता दे दिया।

 

हाँ पहुँच कर उन सब गोपियों ने दुर्वासा मुनि की परिक्रमा की और उनके सम्मुख सारी सामग्री रख दी। और विनती की- “मुने ! हमारा अन्न ग्रहण कीजिए, भोजन कीजिए।”

 

गोपियों का भक्ति भाव देख कर मुनि बोले- “गोपियों ! मै कृतकृत्य परहंस हूँ, निष्क्रिय हूँ, इसलिए तुम गोपियाँ स्वयं ही मेरे मुँह में ये भोजन डाल दो।

 

ये कहकर मुनि दुर्वासा ने अपना मुँह खोल लिया।

 

गोपियाँ प्रेम भाव से उन्हें ये सब खिलातीं जा रहीं थी और मुनि श्रेष्ठ खाते जा रहे थे।

 

अब जाने का समय हो गया जानकर गोपियाँ बोली- “हे मुनिवर ! आते समय तो श्रीकृष्ण जी ने हमें जो कहने को बताया था, वे हमने पूरे लग्न से यमुना जी को बोल दिया था तो उन्होंने हमें रास्ता दे दिया था, परन्तु अब क्या करें?”

 

दुर्वासा ऋषि बोले- “आप सरिताओं की शिरोमणि यमुना जी के पास जा कर रहें कि अगर दुर्वासा मुनि इस भूतल पर केवल दुर्वा का रस पीकर रहते हैं, कभी अन्न और जल को नहीं लेते और निराहार व्रत का पालन करते हैं तो आप हमें रास्ता दे दें।”

 

गोपियाँ उनसे प्रश्न करने का कोई साहस तो कर नहीं सकती थी, अविश्वास का भी कोई सवाल नहीं था। वे यमुना तट पर आईं और ऋषि द्वारा कहीं बात को कह दिया। यमुना जी ने उन्हें रास्ता दे दिया।

 

गोपियाँ बहुत विचार करती हुई श्रीकृष्ण जी के पास आईं और बोली- “प्रभो ! हमने दुर्वासा ऋषि का दर्शन पा लिया है परन्तु हमारे मन का संदेह दूर करें। अघनाशन ! आप तो गोपियों के उपपति हैं और हमने जहां तक आप को जाना है आप तो बचपन से ही रसिक हैं, फिर आप बाल-ब्रह्मचारी कैसे हुए, यह हमें समझाएँ; और हमारे सामने ही सारा छप्पन भोग खा जाने वाले आपके दुर्वासा मुनि केवल दूर्वाका रस पीकर रहने वाले कैसे हैं?”

 

निर्ममो निरहंकारः समानः सर्वगः परः ॥

 

सदावैपम्यरहितो निर्गुणोहं न संशयः ॥ ४५ ॥

 

तथापि भक्तान्भजतो भजेहं वैयथायथा ॥

 

तथैव साधुज्ञीनी वैवैपम्यरहितः सदा॥ ४६ ॥

 

न बुद्धिभेदं जनयेद अज्ञानां कर्मसंगिनाम् ॥

 

जोपयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरेत् ॥४७॥

 

यस्य सर्वेसमारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः ॥

 

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥ ४८ ॥ निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥

 

शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४९ ॥

 

श्रीभगवान्ने बोले- “गोपियो ! मैं किसी भी प्रकार की ममता और अहंकार से रहित हूँ। सबके प्रति मैं समान भाव रखता हूँ। इसमें तुम को कोई संशय नहीं होना चाहिए। मैं सर्वव्यापी हूँ, सबसे उत्कृष्ट हूँ, मेरे अन्दर किसी भी प्रकार की विषमता नहीं है। मैं सदा प्राकृतिक गुणों से रहित रहता हूँ। मेरे भक्त, मुझे जिस प्रकार से भजते हैं, जिस रूप में मुझे पाना चाहते हैं, मुझ से उनको कैसी भी अपेक्षा होती है वे मैं पूर्ण करता हूँ। और उन भक्तों की भाँति मैं भी उनको, उनके ही चाहने वाले रूप में भजता हूँ, ये समझ लो तुम गोपियों, इस में कुछ संशय मत करो।

 

 मेरी तरहं से ही ज्ञानी उच्च कोटी के विद्वान साधु-महात्मा भी यही करते हैं। वे भी तरहं की विषम भावनाओं से रहित रहते हैं। वे अपने द्वारा किये हुए कर्मों में आसक्त नहीं होते, वे केवल अपना कर्म ही करते हैं। जिस प्रकार से कीचड़ में खिल कर भी कमल उस गन्दगी से लिप्त नहीं होता और मुझे सबसे प्रिय है, उसी प्रकार से जिनके मन में कोई तृष्णा और मोह नहीं है, जो केवल अपने शरीर निर्वाह के लिए ही कर्म करता है, जिसने अपनी बुद्धि को अपने वश में किया हुआ है, वे मुझे प्रिय है। मैं भी उस की तरहं से उस का भक्त हूँ, मैं भी उसकी प्रत्येक इच्छा पूरी करता हूँ।

 

गोपियों! इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र वस्तु कोई और है ही नहीं, जिसने उसे पा लिया, तो फिर उसे कुछ और की तृष्णा ही नहीं रहती, किसी दूसरी वस्तु की ज़रूरत ही नहीं रहती। योगसिद्ध पुरूष समय आने पर स्वयं ही ज्ञाता प्राप्ति कर लेता है। उसे पुस्तकों या किसी आश्रम की आवश्यकता नहीं रहती। उस की आत्मा ही उस की गुरू है। तुम्हारे चाहने के कारण से दुर्वासा मुनि भी बहुत खाने वाले हो गये, उन्हें कोई तृष्णा नहीं थी, परन्तु तुम्हारे मान के लिए उन्होंने वे सब खाया जो भी तुम सब ने उन्हें खिलाया। मैं भी अपने चाहने वाले भक्तों का अनादर नहीं करता, उनकी हर इच्छा को पूरा करता हूँ। ना मैं किसी वस्तु विशेष से आसक्त हूँ और ना ही दुर्वासा मुनि।”॥ ४५-५२॥

 

स लीला से बहुत स्पष्ट समझ आता है कि कृष्ण केवल भावना के पुजारी है, वे इच्छा पूरी करते हैं उसको अपने में रख नहीं लेते। (कृष्ण एक सत्यज्ञान पुस्तक के अंश)

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