साल के अंत के साथ ही मैनें अब पुराण, वेद इत्यादि सारे धार्मिक ग्रंथ पढ़ने का मन बना लिया था। मेरे पास अब क्षितिज ने कोई काम करने को छोड़ा ही नहीं, जो मैं कहता हूँ वह उसे पूरा कर देता।
मैनें बहुत से पुराण मंगा लिए थे और पढ़ना भी शुरू कर दिया।
14 अक्टूबर 2023 को मैनें सोच लिया है कि भगवान शंकर ही मेरे गुरु रहेंगे। मैं उन्हीं से प्रार्थना करूँगा कि मुझे मार्गदर्शन करें।
अगले दिन नवरात्रि का पहले दिन मैनें शंकर भगवान को गुरु धारण करके ध्यान लगाया। मुझे उन्होंने एक नया मार्ग बताया। उस मार्ग के कारण बहुत परिवर्तन देखा मैनें। जिस ध्यान को लगाने के लिए कभी-कभी बहुत मेहनत करनी पड़ती थी आज वह एक ही प्रयास में सफल हो गया। और आगे जो देखता हूँ वह बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। जय मेरे गुरू देव- (डायरी से)
अगर आपका भाव ठीक है, आप उसे पाना चाहते हैं, तो ईश्वर वे हैं जिससे जब चाहो मिल सकते हो। केवल ह्रदय में उनसे मिलने की लालसा भर होनी चाहिए। मुझे जीवन में कई बार लगा है कि मैं जिस काम के लिए इस पृथ्वी पर आया हूँ वे काम अभी मुझे करने हैं। बार-बार यही एहसास मुझे होता है और मुझे नहीं मालूम कि कृष्ण को कैसे पाना है परन्तु वे मेरे ह्रदय में सदा रहते हैं। एक ज्योति है अन्दर जो हर समय जलती रहती है, मुझे शक्ति के साथ-साथ एक प्रेरणा भी देती रहती है कि अभी और, अभी और। और ये सब कृष्णा के बिना असम्भव है।
आज मैनें श्रीकृष्ण चरित्र मानस पढ़ना शुरू किया।
सोचने पर जो धुँध थी वह धीरे-धीरे छँटने लगी थी। बहुत से प्रश्नों के उतर स्वयं ही मिलने लगे।
श्रीमद्भागवत महापुराण में लिखा भी है कि जब अन्दर की धुँध छंट जाती है तो मानव आत्मा ही उसका गुरु बन जाती है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं। परन्तु आज ये ज्ञान कोई गुरु नहीं देता।
सब बाँहें खोल कर बुला रहे हैं, आओ मेरे पास आओ मैं आपको रोशनी दूँगा, मैं एक शक्ति पुँज हूँ, मैं तुमको ईश्वर से मिलवाऊँगा, मेरे पास रहो।
परन्तु ध्यान से देखना क्या वह ईश्वर को जानते भी हैं। जब ऐसे किसी गुरु से मिलना तो पहला और अंतिम बस एक ही प्रश्न पूछना- “आप पिछली बार ईश्वर से कब मिले थे?” वही उत्तर आपका मार्ग तय करेगा कि आपको किधर जाना है।
आपने राह ढूँढनी है या आगे बढ़ने के लिए सहारा ढूँढना है, तो एक ही उत्तर है- “आप स्वयं।” कहीं से भी आगे बढ़ जाओ, सहारा बन कर ईश्वर हर क़दम पर खड़े मिलेंगे।
मैं कह सकता हूँ कि ये हमारे वेद-पुराण हमको बचपन से ही पढ़ने चाहिए। अगर हम ऐसा करें तो हमें कोई अँधेरी गुफा नहीं दिखेगी, कहीं भटकना नहीं पड़ेगा और कुछ भी धुँधला नहीं दिखेगा।
श्रीकृष्ण कहते हैं- जो निःस्वार्थ भाव से तुम्हारे संग खड़ा रहा हो उसे छोड़ने का पाप कभी मत करना। वह ही तुम्हारा सबसे सच्चा साथी है।
श्रीकृष्ण कहते हैं- “लोग क्या कहेंगे और संसार में हमारी छवि कैसी होगी इसके भय से हमें उस अनमोल व्यक्ति को कभी नहीं खोना चाहिए जो हमें अपना संसार मानता हो।” (इन्वेंटिंग ड्रीम्स किताब के अंश)
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