आम मानस के मन में एक बहुत बड़ी दुविधा रहती है कि महाभारत पढ़नी नहीं चाहिए या घर पर नहीं रखनी चाहिए। महाभारत के पहले अध्याय में एक श्लोक है:
ब्रह्मन् वेदरहस्यं च यच्चान्यत् स्थापितं मया ।
साङ्गोपनिषदां चैव वेदानां विस्तरक्रिया ॥ ६२॥
जब व्यास जी ने अपनी दिव्य दृष्टि से महाभारत का सारा ज्ञान पा लिया तो उन्होंने सृष्टि रचियता ब्रह्मा जी से कहा कि उन्होंने इस महाकाव्य में सम्पूर्ण वेदों, उपनिषदों का एवं उनके सभी अंगों का गुप्त रहस्य तथा दूसरे शास्त्रों का सार एक में ही संकलित कर दिया है, तो ये ग़लत नहीं कहा था व्यास जी ने। ये ही एक ऐसा ग्रन्थ है जिस में सब कुछ है। सभी पुराणों का सार है, वेद हैं, उपनिषदों का सार है और महाभारत की कथा है। श्रीमद्भगवद्गीता भी इसी में हैं। भगवान श्रीकृष्ण की सभी लीलाओं का वर्णन भी इसी में है। रामायण की कथा का सार भी इसी में है। सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन भी इसी में है। चिकित्सा, दान, शिक्षा, न्याय, तीर्थों, समुद्र, मृत्यु, रोग, भय, बुढ़ापा, भूत, वर्तमान और भविष्य का वर्णन भी इसी में है। अर्थ को समझते-समझते इस महाभारत महाकाव्य को विघ्नेश्वर श्रीगणेश जी ने लिखा है। इसे व्यास जी ने शोकातुर प्राणियों के दुःखों का निवारण करने के लिए लिखा है।
श्रद्दधानः सदा युक्तः सदा धर्मपरायणः ।
आसेवन्निममध्यायं नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ २६१॥
महाभारत के इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि धर्म में श्रद्धा और आचरण रखने वाला जो भी व्यक्ति, प्रति दिन इस के अध्याय पढ़ता है वह हर प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। वह किसी भी प्रकार के संकट आने पर भी दुःखों से अछूता रहता है। इस महाभारत में ये भी कहा गया है कि जो इसका पाठ प्रातः-सायं अथवा मध्याह्न में करता है, वह सारे पापों से मुक्ति पा लेता है। उसे लम्बी आयु, यश और विभिन्न प्रकार की कीर्ति मिलती है। इसमें ये भी लिखा हुआ है कि एक बार सभी देवताओं ने इकट्ठे होकर एक तराजू के एक पलड़े पर चारों वेदों को रखा और दूसरे पलड़े पर महाभारत को रखा तो महाभारत वेदों की अपेक्षा अधिक भारी निकला। इसलिए किसी भी प्रकार का संशय ना रख कर महाभारत को घर पर रखना ही चाहिए और नित्य पाठ भी करना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता को केवल पढ़ना नहीं होता, अनुभव करना होता है। तभी इसका रहस्य समझ आयेगा।
हाँ इस अमृत को बहुत समय तक हमसे दूर रखा गया। क्यों ? ये चर्चा का विषय है।
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