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ब नन्दराज जी ने बालक श्रीकृष्ण को राधाजी को सौंप दिया तो वह उन्हें लेकर वन में प्रवेश कर गईं। आसमान में मेघ का दारुण गर्जन गूँज ही रहा था, वज्र जैसा निनाद हो रहा था। वायु के प्रबल वेग से वृक्ष कम्पित हो रहे थे।

 

भी राधा की दृष्टि सामने रत्नकलश युक्त रत्नमण्डल पर गई। मण्डप के बीच में अगुर, चन्दन, कस्तूरी, कुंकम इत्यादि सामग्री रखी हुई थी। बहुत दिव्य दर्पण लगे हुए थे। उत्तम मणियों से बनी हुई मालाएं वहाँ की शोभा बड़ा रही थीं। वहीं पर बहुत से स्वर्ण से निर्मित थालों में वस्त्र रखे हुए थे। जिन पर सोने का काम हो रखा था। नाना प्रकार के आभूषण भी थे। सारा वातावरण मालती की माला से सजा हुआ था।

 

तने में ही राधा के हाथ से बालक कृष्ण गायब हो गये। दूसरी ओर देखा तो एक नवयुवक मुस्कराता हुआ राधा की ओर अपने चंचल नेत्रों से देख रहा था। उसका मनोहर रूप देख कर राधा चकित बिना पलक झपकाएं निहार रही थीं, या ये कहें कि स्तम्भित खड़ी रह गई थीं। उसी समय अपनी कटाक्षयुक्त चितवन से देखते हुए और नये खिले कमल के समान हंसते हुए वह नवयुवक, जो श्रीकृष्ण थे, बोले-

राधे स्मरसि गोलोकवृत्तान्तं सुरसंसदि ।

 

अद्य पूर्णं करिष्यामि स्वीकृतं यत्पुरा प्रिये ॥ ५७ ॥

 

त्वं मे प्राणाधिका राधे प्रेयसी च वरानने ।

 

यथा त्वं च तथाऽहं च भेदो हि नाऽऽवयोर्ध्रुवम॥५८॥

 

“हे प्राणप्यारी राधे ! तुम गोलोक का वृत्तान्त याद करों। जो वहाँ पर देवसभा में घटित हुआ था, मैनें तुम को वचन दिया था, आज वह वचन पूरा करने का समय अब आन पहुँचा है। तुम मुझे मेरे स्वयं के प्राणों से भी प्रिय हो, तुम में और मुझ में कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार से मिट्टी के बिना कुम्हार घट नहीं बना सकता उसी प्रकार से मैं भी इस सृष्टि कार्य में तुम्हारे बिना सक्षम नहीं हूँ। लोक में मुझे सभी कृष्ण कहते हैं परन्तु अगर तुम मेरे साथ होती हो तो सभी मुझे श्रीकृष्ण पुकारने लगते हैं। तुम सर्वशक्ति स्वरूपा मेरी श्री हों। ये वेद का निर्णय है।

 

जो व्यक्ति सारा जीवन मुझे १६ उपचार अर्पित करके मुझे पूजता है, मेरी प्रति उस पर नहीं होती लेकिन जो तुम को पूजता है, तुम्हारा नाम लेता है, वे मुझे प्रिय लगने लगता है।”

 

सा प्रीतिर्मम जायेत राधाशब्दात्ततोऽधिका ।

 

प्रिया न मे तथा राधे राधावक्ता ततोऽधिकः॥७४॥ ब्र.वै.पु.कृ.

 

ब राधा जैसे नींद से जाग गई, वह बोली-“हे माधव ! वह सब मैं कैसे भूल सकती हूँ। मैं आपकी भक्त हूँ, परन्तु आप के मायाजाल में मैं रम गई हूँ, आबद्ध हो गई हूँ। मैं तो आपके भक्त के शापवंश इस धरा पर आई हूँ, ये मैं कैसे भूल सकती हूँ। अभी तो मुझे सौ साल आपसे अलग भी रहना है ये सोच कर ही मेरे प्राण निकल जाते हैं।”

 

ये कथोपकथन अभी हो ही रहा था कि वहाँ पर मुस्कराते हुए ब्रह्माजी सभी देवताओं के संग आ गये। उन्होंने श्रीकृष्णजी को प्रणाम किया और राधिका जी के चरणद्वय को अपने कमंडल से जल लेकर धोया और फिर जल अपनी जटायों पर लगाया। तथा हाथ जोड़कर राधाजी का स्तव किया।

 

मूर्ध्ना ननाम भक्त्या च मातुस्तच्चरणाम्बुजे ।

 

चकार संभ्रमेणैव जटाजालेन वेष्टितम्॥९५॥

 

कमण्डलुजलेनैव शीघ्रं प्रक्षालितं मुदा ।

 

यथागमं प्रतुष्टाव पुटाञ्जलियुतः पुनः॥९६॥ ब्र.वै.पु. श्रीकृ.

 

          “ब्रह्माण्ड में सभी जीव कृष्णजी के अंश हैं, स्त्री समूह माता राधाजी का अंश है, आप माता राधा कृष्ण के प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं और आप जगत् की माता हैं। आपके गुणों का कोई वर्णन नहीं कर सकता। और आप ज्ञान की माता और बुद्धि की जननी हैं। आपकी स्तुति करने की क्षमता किस में हो सकती हैं। मैं या भगवान शिव भी आप के विस्तार के विस्तार के बारे में कुछ नहीं जानते हैं।” – इस प्रकार से कहते हुए ब्रह्माजी स्तुति करने लगे।

 

          फिर ब्रह्माजी ने अग्नि प्रज्वलित करके संविधि हवन पूर्ण किया। तब उन्होंने पिता का कर्त्तव्य पालन करते हुए राधाकृष्ण जी को अग्नि की सात परिक्रमा कराई। तब उन्हें वहाँ पर बिठा कर राधा का हाथ कृष्णजी के हाथ में पकड़वाया और वैदिक मंत्रों का पाठ किया। उसके पश्चात ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण का हाथ राधा की पीठ पर और राधा का हाथ कृष्णजी के वक्षस्थल पर रख कर मन्त्रों का पाठ किया और राधाकृष्ण दोनों से एक दूसरे के गले में पारिजात के फूलों से बनी हुई माला पहनवा कर विवाह को सम्पूर्ण किया।

 

          सी समय सभी देवताओं ने दुन्दुभि बजाई, मुरज, आनक इत्यादि वाद्ययंत्र बजाने लगे। आकाश से पारिजात पुष्पों की वर्षा होने लगी। अप्सराओं का नृत्य होने लगा, गन्धर्वगण गायन करने लगे। सभी लोग राधा-माधव की स्तुति कर रहे थे। और सभी वन्दना कर रहे थे- “हे प्रभु ! आप दोनों की सुदृढ़ भक्ति का हम आपसे वरदान मांगते हैं।” ब्रह्माजी ने अचल भक्ति का वरदान दक्षिणा के रूप में भगवान से मांग लिया।

 

फिर सब राधाकृष्ण को प्रणाम कर के अपने-अपने धाम चले गये।

 

इस राधाकृष्ण जी के विवाह का विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्णजन्म खण्ड के अलावा श्रीगर्ग संहिता के गोलोकखण्ड में भी है।

 

सवाहयामास हरिं चराधिकां प्रदक्षिणं सप्तहि-रण्यरेतसः।ततः श्वतौ ते प्रणमय्य वेदवित्तौ पाठयामास च सप्तमंत्रकम्॥३१॥ गर्ग.स. १ अ. १६ (कृष्ण एक सत्यज्ञान पुस्तक के अंश)

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