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पुराणों में वर्णित ५० करोड़ योजन में फैले हुए ज्योतिपुंज अपने धाम गोलोक से चल कर जब पृथ्वी का दुःख दूर करने के लिए साँवला रूप बनाकर, सिर पर मोरपंख लगाकर श्रीकृष्ण माता देवकी के गर्भ से जन्म लेकर नन्द गाँव में अपने मुँह में पूरे ब्रह्मांड को दिखाते हुए यशोदा जी की गोद में खेलने चले आये,

 

तो कोई भी नहीं समझ पाया कि ये नन्हा सा बालक कान्हा बड़े-बड़े दुराचारियों का नाश करने के लिए इस धरती पर आया असल में भगवान हरि हैं और अब कई राक्षसों का वध और कालिया नाग का मान-मर्दन करते हुए तथा शिक्षा देने के लिए गोपियों के वस्त्र चुरा कर कदम्ब पेड़ पर चढ़ कर गोपालों के बीच में दूध पीते, छप्पन भोग और मक्खन खाते गोवर्धन को उठा कर देवताओं के राजा इन्द्र का मान भंग करेगा और करोड़ों पूर्णिमा के चन्द्रमा की प्रभा से युक्त प्रेमदेवी राधा के संग 

 

होते हुए महारास को देखने के लिए भगवान शिव को भी धरती पर निधिवन में आने को मजबूर कर के मथुरा में बैठे अपने अत्याचारी मामा कंस का वध करके मथुरा वासियों को राजा कंस के अत्याचारों से मुक्त करायेगा।

श्रीधामा के श्राप के कारण से अपनी प्राणवल्लभ राधा को रोती छोड़ कर जब श्रीकृष्ण ने द्वारका बसाई और कालयवन जैसे राक्षस को मृत्यु देकर उसकी १६१०० बेघर हुई रानियों का उद्धार अपने ऊपर कलंक लेकर किया और अपनी आठ पटरानियों के संग अपने मित्र सुदामा के दुखों का अन्त करते हुए अपने संबंधी पांडवों पर हो रहे कौरवों के दुराचारों और अत्याचारों को समाप्त करने के लिए कब उन्होंने अपनी सखी द्रौपदी के चीर हरण में स्वयं को अनुपस्थित रख कर पांडवों में वीरता भरी और स्वयं को युद्ध से अलग रख कर पांडवों को महाभारत जैसे युद्ध के लिए तैयार कर लिया, ये तो इच्छा मृत्यु का वरदान पाये पांडवों के पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य भी नहीं समझ पाए और अंजाने में ही अभिमन्यु का वध कर के पापियों की श्रेणी में खड़े हो गये हैं ये केवल शिखंडी जानते थे कि उनका जन्म ही भीष्म पितामह की मृत्यु के लिए हुआ है।

 

पना विराट रूप दिखा कर कर्म करो-फल नहीं ये समझाने के लिए जब श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे तो दुर्योधन के अन्धे पिता धृतराष्ट्र अपने मित्र, सारथी और विश्वासपात्र संजय के साथ सुन तो रहे थे परन्तु समझ नहीं पाए कि केवल 18 योद्धा ही बचेंगे और दूसरी तरफ़ 3 मिलियन लोगों के मरने के साथ उनके पूरे कुल का नाश करने की भूमिका वह स्वयं बना कर एक ऐसा इतिहास रच रहे थे जिस का कोई दूसरा उदाहरण भविष्य में नहीं होना है।

 

अंत में बचे हुए अत्याचारियों को मारने के लिए रणछोड़ तो श्रीकृष्ण कहलाए परन्तु गांधारी के शाप को सत्य सिद्ध करने के लिए स्वयं ही सब को रोता बिलखता छोड़ कर सूरदास, चैतन्य महाप्रभु, नरसी मेहता और मीरा जैसे कई भक्त बना कर आज तक लोगों के ह्रदय में बस कर विश्वास का एक ऐसा सूत्र बने हुए हैं जिसे इन्सान तो क्या देवता, ऋषि और ब्रह्मांड का कोई देवता भी नहीं छोड़ना चाहता क्योंकि वे एक देवता ही नहीं सृष्टि के रचनाकार, सूत्रधार, करुणा के सागर और राधा के प्राण त्रिगुणात्मरूप भगवान विष्णु का अवतार निराकार पीताम्बर धारी श्रीकृष्ण हैं, जोकि भक्ति द्वारा भक्त तो देख लेता है परन्तु देवता उनका दर्शन करने को तरसते हैं।

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