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मुझे महाकवि जयशंकर प्रसाद जी की कविता “आँसू” का एक अंश याद आ रहा है:

 

“जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति सी छाई।

 

दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आई ।।”

 

ब ध्यान लगाने पर मैं यहाँ होता ही नहीं हूँ। कहीं और चला जाता हूँ। कितना समय बीत जाता है मालूम ही नहीं होता।

 

मैं समझता हूँ कि कृष्ण हमारे केवल ईश्वर नहीं हैं। वे हमारे गुरु भी हैं, सखा भी हैं, रक्षक भी हैं, शाश्वत भी हैं, आनन्दमय भी हैं, आत्मिक भी हैं, संहारक भी हैं, पालनहार भी हैं, हमारी अपेक्षा भी हैं, हमारे करूणानिधान भी हैं, हमारी प्रार्थना भी हैं, हमारे उपदेशक भी हैं, मार्गदर्शक भी हैं, हमारे जीवन के सारथी भी हैं, पूरक भी हैं और प्रेरक भी हैं।

 

न्होंने प्रत्येक युग में हम मानवों को प्रेम का ही संदेश दिया है। अगर किसी बुराई का अन्त करने के लिए उन्होंने अवतार भी लिया तो केवल इसलिए कि कुछ आतताई, प्रेम पर भारी पड़ कर बुराई को ज़िन्दा रखना चाह रहे थे।

गर कहीं भी अर्जुन हैं तो कृष्ण भी ज़रूर आयेंगे,  पुकारना आना चाहिए। कृष्ण आएँगे तो श्री, विजय, विभूति और अचल नीति स्वयं ही आ जाएगी, यही संदेश श्रीकृष्ण गीता के अंतिम 700 वें श्लोक 18/78 में बताते हैं।

 

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

 

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

 

श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला हमें कुछ सिखाती है। पेट में रहते हुए माँ के गीता पढ़ने के बावजूद 69 वर्ष तक कृष्ण को ना जानने वाला, आयु के 70 वें वर्ष में कैसे कृष्ण भक्त बन जाता है, ये कोई भी मुझे देखकर समझ सकता है। ये कृष्ण ही हैं जो ऐसा करवा सकते हैं। भगवान विष्णु से नफ़रत करने वाला पिशाच भी ज्ञान चक्षु खुल जाने पर युगों-युगों तक इनकी एक झलक पाने के इन्तज़ार में बिता देता है, हम तो फिर मानव हैं।

 

क बार मैं ध्यान में था और जिनका भी मैंने समय-समय पर पूजन किया है, उन्हें याद कर रहा था। सबसे पहले मैंने बारह वर्ष केवल संतोषी माता का ही पूजन, दर्शन किया है, उन्हें याद किया तो वे बोली कि मैं ही तो हूँ जो गोधाम का दरवाज़ा दर्शन के लिए तुम्हारे आने पर खोलती हूँ, दरवाज़े पर खड़ी मिलती हूँ । फिर मैंने हनुमान जी को याद किया, तो वे ख़ामोश रहे, कुछ नहीं बोले। उनके दर्शन करने, मैं बारह साल तक लगातार हनुमान मंदिर कनॉट प्लेस में गया हूँ। फिर मैंने अपनी माँ वैष्णो देवी को याद किया तो उन्होंने कहा कि मैं ही तो तुमको श्री राधाकृष्ण जी के द्वार तक लाई हूँ। मैंने हाथ जोड़कर उनकी हृदय से वन्दना की। फिर मैंने जब राधाकृष्ण के सुन्दर सलोने विग्रह को देखा और उनकी करुणा के लिए उनके श्री चरणों में शीश झुकाया तो हनुमान जी बोले- “तुमने सोचा कि यहाँ आने तक, मैंने तुम्हारे लिए क्या कुछ नहीं किया। यहाँ तुमको रोज़ाना लेकर कौन आता है, कभी विचार किया है?”

 

मेरी आँखों से अश्रु धारा बह निकलीं। मैं सोचने लगा, मैं कितना कृतघ्न हूँ। बारंबार मैं हनुमान जी से क्षमा मांग रहा था और वे मुस्कुरा रहे थे परन्तु मेरे नेत्रों का जल आज पूरा बह जाना चाहता था।

 

(इन्वेंटिंग ड्रीम्स पुस्तक के अंश)

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