कृष्ण भगवान हैं, सर्वशक्तिमान हैं, कुछ भी कर सकते हैं, कोई भी संकट उन पर आ ही नहीं सकता; इस बात की सच्चाई को कई बार माता यशोदा ने बहुत नजदीक से देखा और महसूस किया था, परन्तु माँ तो केवल अपने बालक पर आई विपदा को ही देखती है।
जब-जब कान्हा पर कोई विपदा आती थी, माता यशोदा सब भूलकर कान्हा को अपने सीने से लगा कर केवल प्यार और केवल प्यार ही करना चाहती थी, हर बार यही किया उन्होंने। विपदा टल जाने के बाद माता कृष्ण को पकड़ कर अपने वक्ष से लगा लेती तथा उनका मुख एवं नेत्र पुत्र को पाकर खिल उठते। हर्षोत्फुल्ल होकर कृष्ण के मुख कमल का चुम्बन बारम्बार करने लगतीं। उनके ह्रदय से असंख्य आशीषें निकलने लगतीं।
ऐसा ही पूतना वध के पश्चात भी हुआ था। उस समय जो स्त्रोत माता यशोदा के मुख से निकला था वे बहुत ही शक्तिशाली स्त्रोत है। यह सबकी रक्षा करने वाला स्त्रोत है। इसका उपदेश सर्वप्रथम विष्णु जी ने ब्रह्माजी को दिया था। ब्रह्माजी उस समय उनकी नाभि-कमल में थे। ब्रह्माजी ने बाद में इस कवच का ज्ञान शम्भुजी को दिया और शम्भुजी ने कुछ समय बाद इस का ज्ञान दुर्वासा ऋषि को दिया और दुर्वासा ऋषि ने नन्द मंदिर में आकर इसे यशोदाजी को सुनाया। इसका नाम ही ‘श्रीकृष्ण-कवच’ है।
श्रीकृष्णस्ते शिरः पातु वैकुण्ठः कण्ठमेव हि ।
श्वेतद्वीपपतिः कर्णौ नासिकां यज्ञरूपधृक्॥
नृसिंहो नेत्रयुग्मं च जिह्वां दशरथात्मजः ।
अधराववतात्ते तु नरनारायणावृषी ॥
कपोलौ पान्तु ते साक्षात् सनकाद्याः कला हरेः ।
भालं ते श्वेतवाराहो नारदो भ्रूलतेऽवतु ॥
चिबुकं कपिलः पातु दत्तात्रेय उरोऽवतु ।
स्कन्धौ द्वावृषभः पातु करौ मत्स्यः प्रपातु ते ॥
दोर्दण्डं सततं रक्षेत् पृथुः पृथुलविक्रमः ।
उदरं कमठः पातु नाभिं धन्वन्तरिश्च ते॥
मोहिनी गुह्यदेशं च कटिं ते वामनोऽवतु ।
पृष्ठं परशुरामश्च तवोरू बादरायणः ॥
बलो जानुद्वयं पातु जङ्घे बुद्धः प्रपातु ते ।
पादौ पातु सगुल्फौ व कल्किर्धर्मपतिः प्रभु॥
सर्वरक्षाकरं दिव्यं श्रीकृष्णकवचं परम् ।
इदं भगवता दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥
ब्रह्मणा शम्भवे दत्तं शम्भुर्दुर्वाससे ददौ ।
दुर्वासाः श्रीयशोमत्यै प्रादाच्छ्रीनन्दमन्दिरे ॥
अनेन रक्षां कृत्वास्य गोपीभिः श्रीयशोमती ।
पाययित्वा स्तनं दानं विप्रेभ्यः प्रददौ महत्॥
(गर्ग०, गोलोक० १३ । १५ – २४)
इस स्त्रोत का अर्थ है कि मेरे लाल ! तुम्हारे सिर की रक्षा श्रीकृष्ण करें, भगवान वैकुण्ठ तुम्हारे कण्ठ की रक्षा करें, श्वेतद्वीप के स्वामी तुम्हारे दोनों कानों की रक्षा करें, यज्ञरूपधारी श्रीहरि नासिका की रक्षा करें, नृसिंह भगवान तुम्हारे दोनों नेत्रों की रक्षा करें, दशरथ के लाल श्रीराम तुम्हारी जीभ का रक्षा करें, ऋषि नारायण तुम्हारे अधरों की रक्षा करें, भगवान हरि की कला अवतार सनकादिक चारों ऋषि तुम्हारे कपोलों की रक्षा करें, श्वेतवराह भगवान तुम्हारे माथे की रक्षा करें, नारद भगवान भूमंडल की रक्षा करें। कपिल भगवान तुम्हारी ठोड़ी की रक्षा करें और दत्तात्रेय भगवान तुम्हारे वक्षस्थल की रक्षा करें, ऋषभदेव जी तुम्हारे दोनों कंधों की रक्षा करें, सदा सुरक्षित रखें। मत्सय महाप्रभु तुम्हारे दोनों हाथों की रक्षा करें। पराक्रमी पृथु राजा तुम्हारी भुजाओं की सदा रक्षा करें। कच्छपजी तुम्हारे उदर की और धन्वन्तरिजी सदा तुम्हारी नाभि की रक्षा करें, मोहनी रूप को धारण करने वाले भगवान तुम्हारे गुप्तदेश की रक्षा करें। वामनावतार भगवान तुम्हारी कमर की सदा रक्षा करें। तुम्हारी पीठ की रक्षा परशुराम भगवान करें और बादरायण जी तुम्हारी दोनों जाँघों की रक्षा करें। बलभद्र जी दोनों घुटनों का सदा ख्याल रखें और बुद्धदेव जी तुम्हारी पिंडलियों की कोई हानि ना होने दें। कल्कि भगवान तुम्हारे पांवों की और गुल्फों की रक्षा करें।
इस स्त्रोत का पाठ जिसके लिए भी किया जाए उसकी कोई हानि नहीं हो सकती, ये कहा गया है। यह सर्वकार्य करने वाला दिव्य कवच है। (कृष्ण एक सत्यज्ञान पुस्तक के अंश)
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