तिरुपति मंदिर में दर्शन के बाद जो प्रसाद दिया जाता है उसमें पशुओं की चर्बी इत्यादी का मिलना इतना बढ़ा अपराध है कि उसका पश्चाताप पुराणें में है ही नहीं। क्योंकि वराह भगवान स्वयं कहते हैं कि और जो आत्मज्ञानी होकर भी ऐसा करता है उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
जहाँ वराह पुराण में 32 अपराधों का जिक्र किया गया है वहीं पर वराह पुराण के 136वें अध्याय में अपराध के प्रायश्चित्तों की भी वर्णन किया गया है।
दीपं स्पृष्ट्वा तु यो देवि मम कर्माणि कारयेत् ।
तस्यापराधात् वै भूमि पातं प्राप्नोति मानवः ।। १ ।।
तच्छृणुष्व महाभागे कथ्यमानं मयाऽनघे ।
जायते षष्टिवर्षाणि कुष्ठी गात्रपरिप्लुतः ।
चाण्डालस्य गृहे तत्र एवमेतन्न संशयः ।। २ ।।
एवं भुक्त्वा तु तत्कर्म मम क्षेत्रे मृतो यदि ।
मद्भक्तश्चैव जायेत शुद्धे भागवते गृहे ।। ३ ।।
श्रीवराहदेव पृथ्वी से कह रहे हैं-“हे भूदेवी ! जो व्यक्ति दीप जलाने के पश्चात बिना आचमन किए मुझे स्पर्श करता है उसे जो पाप लगता है और वह इस पाप के कारणवश कुष्ठ रोगी हो जाता है। उसे ६० वर्ष तक चाण्डाल गृह में रहना पड़ता है। इसको भोगने के पश्चात अगर उसकी मृत्यु मेरे तीर्थ पर होती है तो फिर उसका जन्म किसी भागवत घर में होता है। अगर ऐसा मानव किसी भी माह की शुक्ल द्वादशी में भात खाकर खुले आकाश के नीचे सोये तो उसका ये अपराध क्षमा हो जाता है।”
आगे वराह भगवान कहते हैं –“जो व्यक्ति श्मशान से आकर बिना स्नान किए मुझे स्पर्श कर लेते है तो उसे भी दंड मिलता है। इसके कारण से उसे अगले जन्म में गिद्ध या जटायु बनना पड़ता है और वह १४ वर्ष तक श्मशान में रह कर मानव के मांस का भक्षण करता है और उसे लोगों की जूठन खा कर जीवित रहना पड़ता है। भूतमहेश्वर भगवान शिव को भी किसी समय श्मशान में रहना पड़ा था जब उन्होंने त्रिपुर का वध किया था। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक तीन असुरों को मारने के लिए त्रिपुर का विनाश किया था। त्रिपुरासुर तीन शक्तिशाली दैत्य थे—विद्युनमाली, तारकाक्ष, और कमलाक्ष—जो देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार कर रहे थे। इन असुरों ने तीन अजेय नगर बनाए थे जिन्हें त्रिपुर कहा जाता था। ये नगर आकाश, पाताल और पृथ्वी लोक में स्थित थे और इनका विनाश केवल तब संभव था जब तीनों नगर एक सीध में आ जाएं, और तभी भगवान शिव उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सकते थे।
त्रिपुरासुरों के आतंक से परेशान होकर देवताओं ने भगवान शिव से मदद मांगी। शिव ने भगवान विष्णु और ब्रह्मा की सहायता से एक विशेष रथ तैयार किया, जिसमें पृथ्वी पहिए, सूर्य और चंद्रमा धुरी, और स्वयं विष्णु बाण बने। इसके बाद, शिव ने अपने त्रिनेत्र से तीनों नगरों का संहार किया और त्रिपुरासुरों का वध किया। और उसके साथ ही कई औरतों, बच्चों और बूढ़े व्यक्तियों का भी वध कर दिया था। इसी कारण से भगवान शिव को श्मशान में रहते हुए ऐसा ही प्रायश्चित्त करना पड़ा था।” ये निम्न श्लोक में कहा गया है।
ततो भक्षय मांसानि पापक्षयचिकीर्ष भोः ।
हिंसमानानि भोज्यानि ये च भोज्यास्तव प्रियाः ॥ 41॥
आगे वराह भगवान कहते हैं कि इससे बचने के लिए मानव अगर १५ दिन तक सारे दिन में केवल चतुर्थ भाग में ही भोजन करके एक वस्त्र धारण करके खुले आकाश के नीचे शयन करें तो भी वह इस पाप से मुक्त हो जाता है।
आगे वराहदेव कहते हैं- “जो व्यक्ति नशा करके मेरे को छूता है तो वह १० वर्ष तक उल्लू की योनि में रहता है और ३ साल तक कच्छप योनि में रहता है। इसके पश्चाताप के लिए अगर वह एक दिन मट्ठा पिये और जौ का ही केवल आहार ग्रहण करें और खुले आसमान के नीचे शयन करें। ऐसा उसे कई दिन तक करना होगा, तब वह इस पाप से मुक्त होता है।”
वराहमांसेन तु यो मम कुर्वीत प्रापणम् ।
मूर्खास्ते पापकर्माणो मम कर्मपरायणाः ।। 57 ।।
यांस्तु दोषान् प्रपद्यन्ते संसारं च वसुन्धरे ।
तानि ते कथयिष्यामि तच्छृणुष्व वसुन्धरे ।। 58 ।।
श्रीवराह भगवान आगे कहते हैं-“मेरी पूजा-अर्चना करने वाला व्यक्ति अगर मांस को या मुझे ना अर्पण करने वाले पदार्थों को मुझे नैवेद्य के रूप में अर्पण करता है तो वह मूर्ख और महापापी की श्रेणी में आता है। हे भूमिदेवी ! मेरे इस वराह रूपी शरीर में जितने भी रोम छिद्र हैं उस पापी को उतने साल तक नरक में रहना पड़ता है। वह शूकर यानि सुअर की योनि में रह कर इस पाप को भुगतता है। उसके नेत्रों की रोशनी चली जाता है, उसे अंधा होकर जीवन बिताना पड़ता है।”
जो लोग भगवान को मांस, मच्छी या किसी जानवर के शरीर का कोई हिस्सा नैवेद्य के रूप में देते हैं ये प्रायश्चित्त वराह पुराण में उनके लिए बताया गया है।
यावत् तत्र च सिक्थानि भाजनेषु प्रतिष्ठिताः ।
तावत्स पतते देवि शौकरीं योनिमास्थितः ।। 61 ।।
अन्धो भूत्वा ततो देवि जन्म चैकं तु तिष्ठति ।
एवं गत्वा तु संसारं वाराहमांसप्रापणात्।। 63 ।।
आगे वराहदेव कहते हैं कि अगर वह पापी ७ दिन तक केवल फल खा कर रहे, ७ दिन तक मूलाहार रहे, सात दिन तक केवल दूध का सेवन करे, ७ दिन तक केवल मट्ठा पिये, सात दिन तक केवल यव यानि जौ का बना खाना खाये और अहंकार का त्याग करके ७ दिन तक केवल दधि का भक्षण करे तो मैं उसके इस प्रायश्चित्त को स्वीकार कर लेता हूँ। इसी प्रकार से अगर कोई मद्यपान करके मेरे पास आता है तो ऐसा व्यक्ति १०००० वर्षों तक दरिद्र रहकर जीवन बिताता है। और जो आत्मज्ञानी होकर भी ऐसा करता है उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है।
जो व्यक्ति बिना धुले कपड़े पहन कर मेरी पूजा अर्चना करता है वह भी पाप का भागी होता है। और ऐसे ही जो मानव अन्धकार में रहकर मेरा पूजन करता है वह दोनों ही २१ वर्ष तक मृग योनि में रहते हैं। या फिर वे अगले जन्म में पैर से लँगड़ा होते हैं, मूर्ख और क्रोधी होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के प्रायश्चित्त के लिए अगर वे मध्य मास की द्वादशी के दिन केवल आठ ग्रास खा कर एकाग्रता का चिन्तन करता हुआ किसी जलाशय में बैठ कर भगवान का भजन करें और फिर सूर्योदय होने पर मेरी आराधना करते हुए बाहर आये तो उसका प्रायश्चित्त होता है।
जो व्यक्ति नये अन्न को भगवान को अर्पण किए बिना खा लेता है वह भी दोषी ही कहलाता है। ऐसे मानव के पितृगण १५ वर्षों के लिए भूखे रह जाते हैं और उसे दंड देते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति को चाहिए कि वह ३ रात्रि उपवास करे और चौथे दिन खुले आकाश के नीचे बैठ कर स्नान करें तो वे शुद्ध होता है। (कृष्ण एक सत्यज्ञान पुस्तक के अंश) (लेखक की दूसरी किताब इन्वेंटिंग ड्रीम्स अमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है)
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